मथुरा मंडल
श्री कृष्ण का जन्म स्थान — कंस का कारागार से लेकर विश्राम घाट तक, प्राचीन मथुरा के प्रमुख मंदिर व तीर्थ।
और पढ़ें →॥ जय श्री राधे ॥
84 कोश दिव्य परिक्रमा एवं मंदिर धरोहर पोर्टल
सप्तपुरी में श्रेष्ठतम — श्री कृष्ण की क्रीड़ास्थली के 84 कोश का प्रामाणिक आध्यात्मिक मार्गदर्शक। मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगांव व कामवन के समस्त अति-प्राचीन विरासत मंदिरों का कोष।
ब्रज मंडल
84 कोश ब्रज मंडल में कुल 12 वन, 24 उपवन, 432 कुंड/सरोवर, 4 प्रमुख धाम और 108 से अधिक मुख्य मंदिर आते हैं। यह परिक्रमा श्री राधा-कृष्ण की नित्य लीलाओं की जीवंत भूमि है — जहाँ प्रत्येक कदम पर एक कथा और प्रत्येक वन में एक धाम बसा है।
तीर्थ क्षेत्र
श्री कृष्ण का जन्म स्थान — कंस का कारागार से लेकर विश्राम घाट तक, प्राचीन मथुरा के प्रमुख मंदिर व तीर्थ।
और पढ़ें →स्वामी हरिदास से षड् गोस्वामी तक — वृंदावन के सप्त देवालय, निधिवन, शाहजी मंदिर व कात्यायनी पीठ की नित्य लीला भूमि।
और पढ़ें →दानघाटी, मानसी गंगा, जतीपुरा मुखारविंद, राधाकुंड-श्यामकुंड, कुसुम सरोवर व पुंछरी का लोटा — गिरिराज की अति-पवित्र भूमि।
और पढ़ें →भानुगढ़ पर लाडली जी मंदिर, मान मंदिर, मोर कुटी, नंद भवन, पावन सरोवर व गुप्त मिलन स्थल संकेत धाम।
और पढ़ें →राधा रानी का जन्म स्थान रावल, चौरासी खंभा नंद भवन, रमण रेती, ब्रह्मांड घाट व चिंताहरण महादेव।
और पढ़ें →राधा-कृष्ण विवाह स्थल भांडीरवन, लक्ष्मी तपोभूमि बेलवन, मानसरोवर व मांठ क्षेत्र।
और पढ़ें →कामेश्वर महादेव, पाण्डवों के चौरासी खंभा, भोजन थाली-फिसलनी शिला, वृंदा देवी व कोकिलावन शनिदेव।
और पढ़ें →विरासत मंदिर
मथुरा मंडल
भगवान श्री कृष्ण का प्राकट्य स्थल — कंस का कारागार। आधुनिक व प्राचीन वास्तुकला, अति-सुरक्षित परिसर।
मथुरा मंडल
राजाधिराज रूप में भगवान कृष्ण की पूजा; 1814 ई. में सेठ गोकुलदास द्वारा निर्मित। राजस्थानी-मराठा स्थापत्य, हिंडोला उत्सव प्रसिद्ध।
मथुरा मंडल
कंस वध के पश्चात भगवान कृष्ण का विश्राम स्थल। लाल बलुआ पत्थर के घाट; नित्य संध्या भव्य यमुना आरती।
मथुरा मंडल
मथुरा की चार दिशाओं के रक्षक देवताओं में से एक — प्राचीन वैष्णव पीठ।
मथुरा मंडल
मथुरा के चार दिग्पालों में से एक (उत्तर दिशा के रक्षक) — अति-प्राचीन स्वयंभू शिव पीठ।
मथुरा मंडल
कंस की कुलदेवी और तंत्र साधना का प्राचीन केंद्र — शक्तिपीठ परंपरा।
प्रश्न · उत्तर
ब्रज 84 कोश परिक्रमा लगभग 252 किलोमीटर (84 कोस × ~3 किमी) की है — पारंपरिक रूप से 40–60 दिनों में नंगे पैर पूर्ण की जाती है।
गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर (14 मील) की है — जतीपुरा मुखारविंद, मानसी गंगा, कुसुम सरोवर व पुंछरी का लोटा होकर।
बांके बिहारी मंदिर सुबह 7:30 से दोपहर 12:00 और शाम 4:45 से रात 9:30 बजे तक खुला रहता है — झांकी (पर्दा) दर्शन होते हैं।
मान्यता है कि निधिवन में आज भी हर रात श्री राधा-कृष्ण महारास करते हैं — शाम की आरती के बाद यहाँ मनुष्य व पशु-पक्षी प्रवेश नहीं करते।
निकटतम स्टेशन मथुरा जंक्शन (14 किमी); दिल्ली से यमुना एक्सप्रेसवे पर ~150 किमी, आगरा से ~70 किमी।
अक्टूबर से मार्च — विशेष रूप से कार्तिक मास, जन्माष्टमी और ब्रज की होली के दौरान धाम का वैभव अपने चरम पर रहता है।